"पहलगाम हमले में शहीद आदिल की बहादुरी की कहानी, पिता ने सुनाया आखिरी किस्सा!"
"पहलगाम हमले में शहीद आदिल की बहादुरी की कहानी, पिता ने सुनाया आखिरी किस्सा!"
श्रीनगर/पहलगाम:
जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले में देश ने एक और वीर सपूत खो दिया – आदिल अहमद। हमले के दौरान आतंकियों की गोलियों का बहादुरी से सामना करते हुए आदिल ने देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। अब उनके पिता ने बेटे की बहादुरी और शहादत के आखिरी क्षणों का जिक्र करते हुए जो कहानी सुनाई है, वो पूरे देश की आंखें नम कर गई है।
हमला और आदिल की वीरता
हमले की यह घटना 14 अप्रैल 2025 की है, जब पहलगाम में तैनात सुरक्षाबलों की एक टीम नियमित गश्त पर थी।
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तभी घात लगाकर बैठे आतंकियों ने अचानक हमला कर दिया।
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गोलियों की बौछार शुरू हुई और चारों ओर अफरा-तफरी मच गई।
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इसी दौरान आदिल ने मोर्चा संभाला और आतंकियों को मुंहतोड़ जवाब दिया।
हालांकि आदिल इस हमले में गंभीर रूप से घायल हो गए। बाद में उन्हें एयरलिफ्ट कर अस्पताल ले जाया गया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
पिता ने सुनाया आखिरी किस्सा
शहीद आदिल के पिता बशीर अहमद ने जब मीडिया से बात की तो उनकी आंखों में आंसू और चेहरे पर गर्व था।
उन्होंने बताया,
"हमेशा से ही आदिल देश के लिए कुछ करना चाहता था। वो कहता था – अब्बा, जब वर्दी पहनूंगा, तो दुश्मनों की आंखों में आंख डालकर जवाब दूंगा।"
"हमने आखिरी बार बात सुबह 8 बजे की थी। उसने कहा, सब ठीक है अब्बा। शाम को बात करेंगे। लेकिन शाम को फोन नहीं आया, बल्कि उसके शहीद होने की खबर आई..."
उनके शब्दों में बेटे के खोने का दुख भी था और शौर्य का अभिमान भी।
बचपन से था सेना का जुनून
आदिल का जन्म कुलगाम जिले के एक छोटे से गांव में हुआ था।
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वह बचपन से ही बहादुरी के किस्से सुनते-सुनते बड़ा हुआ।
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हर 26 जनवरी और 15 अगस्त को आदिल अपनी यूनिफॉर्म पहनकर परेड में भाग लेता था।
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परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी, लेकिन उसका जज्बा हमेशा ऊंचा था।
जब उसने सेना में भर्ती की परीक्षा पास की, तो पूरे गांव में जश्न का माहौल था। वह अक्सर कहा करता था,
"अगर मैं शहीद हुआ, तो मेरी मां को गर्व होना चाहिए, आंसू नहीं।"
गांव में मातम, लेकिन गर्व का माहौल
आदिल की शहादत की खबर जब उसके गांव पहुंची, तो चारों ओर मातम छा गया।
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गांव के हर घर में शोक और गर्व का मिश्रित भाव था।
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जब उसका शव तिरंगे में लिपटा गांव पहुंचा, तो 'भारत माता की जय', 'शहीद आदिल अमर रहे' के नारे गूंज उठे।
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स्कूलों, दुकानों और पंचायत भवन में राष्ट्रीय ध्वज झुका दिया गया।
सरकार और सेना ने दी श्रद्धांजलि
शहीद आदिल को सेना, प्रशासन और स्थानीय नेताओं ने श्रद्धांजलि दी।
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सेना के उच्चाधिकारियों ने कहा,
"आदिल जैसा बहादुर जवान किसी भी सेना की शान होता है। उसने अपने कर्तव्य का सर्वोच्च उदाहरण पेश किया।"
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जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल ने भी आदिल के परिवार से मुलाकात कर संवेदना जताई और सरकारी सहायता का आश्वासन दिया।
आदिल के सपनों की अधूरी कहानी
शहीद आदिल के परिवार में उसके माता-पिता, दो बहनें और एक छोटा भाई है।
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उसका सपना था कि बहनों की शादी अच्छे से हो और छोटा भाई भी पढ़-लिखकर फौज में भर्ती हो।
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वह अपने पहले वेतन से मां को कश्मीरी शाल और पिता को घड़ी देना चाहता था। लेकिन अब ये सपने अधूरे रह गए।
बशीर अहमद ने कहा,
"अब हम चाहेंगे कि सरकार आदिल के नाम पर गांव में एक स्कूल बनाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां उसके बलिदान को याद रखें।"
निष्कर्ष: आदिल – सिर्फ एक जवान नहीं, एक प्रेरणा
आदिल की शहादत केवल एक जवान के बलिदान की कहानी नहीं है, बल्कि कश्मीर के उस बेटे की मिसाल है जिसने देश के लिए अपनी जान दे दी।
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वह उन हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा है जो देश सेवा का सपना देखते हैं।
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उसकी कहानी हमें याद दिलाती है कि देश की सुरक्षा के लिए हर रोज कई आदिल सीमा पर जान हथेली पर रखकर खड़े होते हैं।
आदिल तुम अमर हो। भारतवर्ष तुम्हें सलाम करता है।

