Breaking News "दिहुली नरसंहार: 40 साल बाद मैनपुरी कोर्ट का फैसला, 3 दोषियों को फांसी!"
उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले में 44 साल पुराने दिहुली नरसंहार मामले में विशेष डकैती अदालत ने तीन आरोपियों को दोषी करार दिया है। यह घटना 18 नवंबर 1981 को हुई थी, जब दिहुली गांव में 24 दलितों की निर्मम हत्या कर दी गई थी। अदालत ने 12 मार्च 2025 को इस मामले में फैसला सुनाया, जबकि सजा का ऐलान 18 मार्च 2025 को किया जाएगा।
घटना का पृष्ठभूमि:
18 नवंबर 1981 की शाम को, राधेश्याम (उर्फ राधे) और संतोष के नेतृत्व में एक डकैत गिरोह ने दिहुली गांव पर हमला किया। उन्होंने पुरुषों, महिलाओं और बच्चों सहित 24 दलितों की गोली मारकर हत्या कर दी और उनके घरों में लूटपाट की। यह हमला इसलिए किया गया था क्योंकि डकैतों को शक था कि गांववाले पुलिस के मुखबिर हैं।
मुकदमे की प्रक्रिया:
घटना के बाद, लायक सिंह नामक व्यक्ति ने 19 नवंबर 1981 को जसराना थाने में राधेश्याम, संतोष सिंह और 15 अन्य के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई। जांच के बाद, 17 आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया गया। मुकदमे के दौरान, 13 आरोपियों की मृत्यु हो गई, जबकि एक आरोपी फरार है। शेष तीन आरोपियों—कप्तान सिंह, रामपाल और रामसेवक—ने मुकदमे का सामना किया।
अदालत का फैसला:
12 मार्च 2025 को, विशेष न्यायाधीश इंदिरा सिंह ने कप्तान सिंह, रामपाल और रामसेवक को दोषी करार दिया। अदालत ने सजा सुनाने के लिए 18 मार्च 2025 की तारीख निर्धारित की है। दोषियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या) और अन्य संबंधित धाराओं के तहत दोषी पाया गया है।
पीड़ित परिवारों की प्रतिक्रिया:
44 साल बाद आए इस फैसले से पीड़ित परिवारों में मिश्रित भावनाएं हैं। कुछ परिवार न्याय मिलने से संतुष्ट हैं, जबकि अन्य इतने लंबे समय तक न्याय की प्रतीक्षा से निराश हैं। कई पीड़ित परिवारों के सदस्य इस दुनिया में नहीं रहे, जो इस न्याय को देख सकते।
सामाजिक और राजनीतिक प्रतिक्रिया:
घटना के समय, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पीड़ित परिवारों से मुलाकात की थी, जबकि विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने भी अपनी एकजुटता दिखाने के लिए प्रभावित क्षेत्र का दौरा किया था। वर्तमान में, इस फैसले को न्याय की जीत के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन साथ ही न्याय प्रक्रिया में देरी पर सवाल भी उठाए जा रहे हैं।
निष्कर्ष:
दिहुली नरसंहार भारतीय न्याय प्रणाली के लिए एक महत्वपूर्ण मामला है, जो न्याय में देरी और पीड़ितों के अधिकारों के संरक्षण पर प्रकाश डालता है। इस फैसले से यह संदेश जाता है कि अपराध कितना भी पुराना क्यों न हो, न्याय की प्रक्रिया चलती रहती है, और दोषियों को उनके कृत्यों के लिए सजा मिलती है।

